ताल और तीनताल: 16 मात्रा, ठेका और सम की सरल व्याख्या

ताल और तीनताल: 16 मात्रा, ठेका और सम की सरल व्याख्या

ताल (जिसे अंग्रेज़ी में tala भी लिखा जाता है) वह लयात्मक चक्र है जो भारतीय शास्त्रीय संगीत को व्यवस्थित रखता है। तीनताल हिंदुस्तानी संगीत की सबसे प्रचलित ताल है, जिसमें 16 मात्राएँ होती हैं, जो चार-चार मात्राओं के चार विभागों में बँटी रहती हैं। पहली मात्रा को सम कहा जाता है, ताली 5वीं और 13वीं मात्रा पर पड़ती है और 9वीं मात्रा पर खाली (हाथ की लहर) होती है। तबले पर बजने वाले इसके मूल बोल-समूह को ठेका कहते हैं।

अद्यतन: 12 अक्टूबर 2026। यह श्रोताओं और आरंभिक विद्यार्थियों के लिए एक परिचय है; अलग-अलग गुरु और घराने कुछ रचनाओं को भिन्न ढंग से गिन सकते हैं, उनके नाम बदल सकते हैं या उन्हें अलग तरह से सजा सकते हैं।

तबला बजाते हुए एक कलाकार; हिंदुस्तानी संगीत में ताल को थामे रखने वाला प्रमुख वाद्य
प्रस्तुति के दौरान एक तबला वादक। फ़ोटो: Bharath chandra badavath, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।

एक नज़र में ताल

तालमात्राएँविभाजनप्रमुख उपयोग
तीनताल164+4+4+4गायन और वादन का शास्त्रीय संगीत, कथक
झपताल102+3+2+3मध्य लय के ख़याल और वाद्य रचनाएँ
एकताल122+2+2+2+2+2विलंबित ख़याल
रूपक73+2+2सुगम शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत
दादरा63+3ठुमरी, ग़ज़ल और फ़िल्मी गीत
कहरवा84+4लोकगीत, भजन और फ़िल्मी गीत

भारतीय संगीत में ताल क्या है?

ताल मात्राओं का एक बार-बार दोहराया जाने वाला चक्र है, जो किसी संगीत-रचना को एक सूत्र में बाँधे रखता है। जहाँ राग भारतीय संगीत को उसकी स्वर-रचना यानी सुर देता है, वहाँ ताल उसे समय देती है। ताल केवल गति (टेम्पो) या टाइम सिग्नेचर भर नहीं है। यह एक ऐसा चक्र है जिसके अपने भीतरी विभाजन हैं, ज़ोर और विश्राम के अपने स्थान हैं और बोलों के नाम से जाने जाने वाले अपने उच्चारित अक्षर हैं। कलाकार पूरे चक्र को ध्यान में रखकर सोचता है, और श्रोता उस क्षण को महसूस करते हैं जब चक्र लौटकर पहली मात्रा, यानी सम, पर आता है; सम ही पहुँचने का वह बिंदु है जहाँ हर रचना टिकती है।

“ताल” शब्द संस्कृत से आया है और इसका संबंध ताली की अवधारणा से जोड़ा जाता है। व्यवहार में ताल को हाथ से दिखाया जाता है: ताली ज़ोर वाली मात्रा को चिह्नित करती है और हाथ की लहर, यानी खाली (अर्थात रिक्त), उस मात्रा को जिस पर ताली नहीं पड़ती। किसी प्रस्तुति को समझना हो तो किसी गायक या तबला वादक को घुटने पर चक्र थपकते हुए देखिए; ताल कैसे काम करती है, यह समझने का यह सबसे तेज़ तरीका है। इसी व्यवस्था के स्वर-पक्ष के लिए हमारी शुरुआती मार्गदर्शिका राग क्या है पढ़ें।

तीनताल क्या है और इसमें कितनी मात्राएँ होती हैं?

तीनताल में 16 मात्राएँ होती हैं, जो चार-चार मात्राओं के चार विभागों में बँटी रहती हैं। नाम का अर्थ है “तीन तालियाँ”, क्योंकि इस चक्र में तीन तालियाँ और एक खाली होती है। मात्राओं का क्रम इस प्रकार है:

  1. मात्रा 1 (सम)। पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण मात्रा, जिस पर ताली पड़ती है। हर चक्र यहीं से शुरू होता है और यहीं आकर पूरा होता है।
  2. मात्रा 5। दूसरी ताली, जो दूसरे विभाग का आरंभ बताती है।
  3. मात्रा 9 (खाली)। हाथ की लहर, बिना ताली के, जो चक्र को एक हल्का खंड देती है।
  4. मात्रा 13। तीसरी ताली, जहाँ से चक्र फिर सम की ओर लौटता है।

तबले पर बजने वाला बोल-समूह ही ठेका है: धा धिन धिन धा, धा धिन धिन धा, धा तिन तिन ता, ता धिन धिन धा। ध्यान दीजिए कि खाली वाले तीसरे विभाग में हल्के, कम गूँज वाले बोल (तिन, ता) आते हैं, जिससे चक्र के सम पर लौटकर पूरे स्वर वाले “धा” पर पहुँचने से पहले कानों को हल्केपन का अहसास मिलता है। तीनताल का प्रयोग ख़याल गायन में, सितार और सरोद वादन में तथा कथक नृत्य में होता है, और इसीलिए अधिकांश विद्यार्थी सबसे पहले यही ताल सीखते हैं।

ठेका क्या है और बोल किसे कहते हैं?

ठेका किसी ताल का मूल स्वरूप है, जिसे संगत के रूप में बार-बार दोहराकर बजाया जाता है। हर मात्रा का एक बोल होता है, यानी एक उच्चारित अक्षर जो वाद्य पर पड़ने वाले आघात की ध्वनि की नकल करता है। उदाहरण के लिए, “धा” में दोनों हाथों के आघात मिले होते हैं, इसलिए इसकी ध्वनि भरी और गूँजदार होती है, जबकि “तिन” और “ता” केवल दाहिने वाद्य पर बजने वाले खुले आघात हैं। तबला सीखने वाले बजाने से पहले इन बोलों को बोलकर याद करते हैं, और तबला वादक संगीत-सभाओं में लंबी रचनाओं को बजाने से पहले उन्हें ज़ुबान से पढ़कर भी सुनाते हैं। वाद्य को विस्तार से जानने के लिए हमारी मार्गदर्शिका तबले के अंग, इतिहास और घराने पढ़ें।

हाथ से तबला बनाता एक कारीगर; ताल बजाने में काम आने वाली यह जोड़ी
तबला बनाता एक कारीगर। फ़ोटो: gurdeep singh, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।

हिंदुस्तानी संगीत की अन्य प्रचलित तालें कौन-सी हैं?

कई तालें इतनी बार सुनने को मिलती हैं कि नियमित श्रोता उन्हें अनुभव से ही पहचानने लगता है।

  • झपताल (10 मात्राएँ)। 2+3+2+3 के विभाजन वाली यह ताल असमान, लँगड़ाती-सी चाल की होती है और मध्य लय की रचनाओं में प्रयुक्त होती है।
  • एकताल (12 मात्राएँ)। छह जोड़ियों में बँटा यह धीमा और खुला चक्र है, जो ख़याल प्रस्तुति के आरंभ के लिए उपयुक्त बैठता है।
  • रूपक (7 मात्राएँ)। 3+2+2 के विभाजन वाली यह ताल अनोखी है, क्योंकि यह ताली से नहीं बल्कि खाली से शुरू होती है, इसलिए पहली मात्रा हल्की लगती है।
  • दादरा (6 मात्राएँ) और कहरवा (8 मात्राएँ)। छोटे, लचकदार चक्र, जिनका प्रयोग ठुमरी, ग़ज़ल, भजन, लोकगीतों और फ़िल्मी संगीत में होता है।

बहुत-से श्रोता कहरवा और दादरा को बिना जाने ही सुनते रहते हैं, क्योंकि ये अनगिनत फ़िल्मी गीतों की नींव में होती हैं। जब आप चार मात्राओं के समूह और तीन मात्राओं के समूह में फ़र्क करना सीख लेते हैं, तो अकेली धड़कन से ही अक्सर ताल पहचान सकते हैं।

पंडित शुभंकर बनर्जी संगीत-सभा में तबला बजाते हुए
तबले पर शुभंकर बनर्जी। फ़ोटो: RamadasNR, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।

सम, ताली, खाली और लय जैसे प्रमुख शब्द कैसे काम करते हैं?

ताल की लगभग हर व्याख्या में यही कुछ शब्द बार-बार आते हैं, और इन्हें सीखना आसान है।

  • मात्रा। एक अकेली गिनती या धड़कन। ताल को मात्राओं में गिना जाता है।
  • विभाग। चक्र का एक खंड, जैसे तीनताल में चार मात्राओं का एक समूह।
  • सम। पहली मात्रा, लौटकर आने का बिंदु और हर स्वर-पंक्ति का चरम।
  • ताली और खाली। हाथ की थाप और लहर, जो बताती हैं कि विभाग कहाँ से शुरू होते हैं।
  • लय। गति, जिसे सामान्यतः विलंबित (धीमी), मध्य (मध्यम) या द्रुत (तेज़) कहा जाता है।
  • तिहाई। तीन बार दोहराया जाने वाला ऐसा टुकड़ा जो ठीक सम पर समाप्त होता है; प्रस्तुति के सबसे संतोष देने वाले क्षणों में से एक।

कर्नाटक संगीत में ताल (तालम्) कैसे अलग है?

दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत भी ताल का प्रयोग करता है, पर उसकी बनावट अलग है। तीनताल जैसे निश्चित नामों वाले स्थिर चक्रों के बजाय कर्नाटक संगीत सात मूल ताल-परिवारों की एक पद्धति से चक्र रचता है, जिनमें से हर एक को पाँच अलग-अलग जातियों (विभाजनों) के साथ जोड़ा जा सकता है, जिससे सैद्धांतिक रूप से संभावित चक्रों की बड़ी संख्या बन जाती है। इनमें सबसे प्रचलित आदि ताल है, जो आठ मात्राओं का चक्र है; इसमें चार मात्राओं की एक इकाई के बाद दो-दो मात्राओं की दो इकाइयाँ आती हैं, और खंडों को ताली, अँगुलियों की गिनती तथा लहर से दिखाया जाता है। इसका प्रमुख वाद्य मृदंगम है, जो दोनों ओर मढ़ा हुआ बेलनाकार ढोल है; उसकी संगत अक्सर घटम (अँगुलियों से बजने वाला मिट्टी का घड़ा) और कंजीरा (छोटा फ्रेम-ड्रम) करते हैं। दोनों परंपराओं की पूरी तुलना के लिए हमारी मार्गदर्शिका हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत पढ़ें।

मृदंगम, दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत का दोनों ओर मढ़ा हुआ बेलनाकार ढोल
मृदंगम, कर्नाटक संगीत का प्रमुख ढोल। फ़ोटो: Gausanchennai, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।
वेमुलवाड़ा में एक प्रस्तुति के दौरान बजाया जा रहा घटम, मिट्टी के घड़े का ताल-वाद्य
वेमुलवाड़ा में घटम की प्रस्तुति। फ़ोटो: Department of Language and Culture, Government of Telangana, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।

भारत के कौन-से वाद्य ताल को थामे रखते हैं?

भारत में लय को कई प्रकार के ताल-वाद्य सँभालते हैं। उत्तर में तबले का बोलबाला है, दक्षिण में मृदंगम का, और पखावज, जो एक पुराना बेलनाकार ढोल है, ध्रुपद की संगत करता है। क्षेत्रीय लोक परंपराओं के अपने वाद्य हैं: उदाहरण के लिए, असम में भक्ति-गायन के दौरान खुटी ताल नाम की छोटी झाँझों की जोड़ी समय बनाए रखती है। कथक जैसी नृत्य-शैलियों की भी अपनी लय-भाषा है, और नर्तक के पाँव स्वयं एक ताल-वाद्य का काम करते हैं। लय और भाव-भंगिमा के मेल को समझने के लिए भारत की शास्त्रीय नृत्य शैलियों के बारे में पढ़ें।

खुटी ताल, असम के भक्ति संगीत में लय रखने के लिए प्रयुक्त छोटी झाँझें
खुटी ताल, असम की छोटी झाँझें। फ़ोटो: Aniruddha Buragohain, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0 (आकार बदला गया)।

संगीतकार ताल के भीतर सुधार या कल्पना-विस्तार कैसे करते हैं?

चूँकि चक्र निश्चित होता है, इसलिए कलाकार उसके साथ खेल सकता है। गायक या वादक सम से कुछ मात्राएँ पहले कोई पंक्ति शुरू कर सकता है और ठीक सम पर आकर उतर सकता है, या किसी पंक्ति को कई चक्रों तक खींचकर फिर लौट सकता है। समय के साथ इस खेल को लयकारी कहते हैं। तबला वादक के पास भी अपने कई साधन होते हैं: पहले ठेका, फिर उसके विविध रूप, और उसके बाद कायदा (एक थीम और उसके विस्तार), टुकड़ा और चक्रधार (तीन बार दोहराया जाने वाला ऐसा टुकड़ा जो सम पर उतरता है) जैसी रचनाएँ। अच्छी संगीत-सभा में एकल कलाकार और संगतकार भूमिकाएँ बदलते रहते हैं: तबला चक्र को स्थिर रखता है और स्वर-वाद्य विस्तार करता है, फिर तबला अपनी बारी लेता है और स्वर-वाद्य कोई छोटी टेक दोहराता रहता है।

प्रशिक्षित श्रोता का रोमांच प्रतीक्षा से आता है। सब जानते हैं कि सम ठीक कब आने वाला है, इसलिए लंबे और जटिल रास्ते से गुज़रने के बाद जब कोई पंक्ति ठीक उसी मात्रा पर आकर उतरती है, तो पूर्णता का जो अहसास होता है, उसे श्रोता अक्सर तालियों या “वाह” की पुकार से स्वीकार करते हैं।

ताल की अवधारणा कहाँ से आई?

लयात्मक चक्रों के विचार भारतीय चिंतन में बहुत पुराने हैं। नाट्य और संगीत पर लिखे प्राचीन ग्रंथ, जैसे नाट्यशास्त्र, रंगमंच और गायन में काल-मान और लय पर चर्चा करते हैं, और बाद के मध्यकालीन तथा आरंभिक आधुनिक ग्रंथों ने उन पद्धतियों को विकसित किया जो आज पढ़ाई जाती हैं। क्षेत्रीय परंपराएँ समानांतर रूप से बढ़ती रहीं, और पिछली कुछ सदियों में हिंदुस्तानी तथा कर्नाटक पद्धतियाँ अपने वर्तमान स्वरूप में स्थिर हुईं। इतिहासकारों में इस पर मतभेद है कि विशिष्ट ढोल और चक्र कैसे और कब आए, इसलिए सबसे उचित सार यही है कि ताल एक लंबे समय में विकसित हुई परंपरा है, किसी एक व्यक्ति या किसी एक सदी का आविष्कार नहीं।

देखिए: प्रस्तुति में ताल और तबला

ये तीन वीडियो ऊपर बताई गई बातों को सुनकर समझने में मदद करते हैं। पहला तीनताल का परिचय है, दूसरा नए श्रोताओं के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत की बुनियादी बातें समझाता है, और तीसरा ज़ाकिर हुसैन का तीनताल में तबला वादन (सोलो) है। ये तीसरे पक्ष के वीडियो हैं और इनमें व्यक्त विचार उनके निर्माताओं के अपने हैं।

शुरुआती व्यक्ति ताल को समझना कैसे सीख सकता है?

ताल को समझने के लिए आपका संगीतकार होना ज़रूरी नहीं है। तीनताल और सोलह मात्राओं की गिनती से शुरू कीजिए। तबला वादन या ख़याल की कोई धीमी रिकॉर्डिंग चलाइए और एक से सोलह तक गिनिए; मात्रा 1, 5 और 13 पर ताली दीजिए और मात्रा 9 पर हाथ लहराइए। कुछ ही मिनटों में आपको वह क्षण सुनाई देने लगेगा जब कलाकार सम पर उतरता है, जो हर पंक्ति का लक्ष्य है। फिर कहरवा आज़माइए, जो आठ मात्राओं का चक्र है, और देखिए कि उसका अनुभव कैसा अलग लगता है।

जब आप एक चक्र को पकड़ने लगें, तो किसी प्रसिद्ध प्रस्तुति को सुनिए। हमारे लेख प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीतकार में जिन कलाकारों का वर्णन है, उनमें तबला के उस्ताद भी शामिल हैं; और बाँसुरी या वीणा जैसा कोई स्वर-वाद्य सुर और लय को साथ काम करते हुए सुनने का स्वाभाविक अवसर देता है। संगीत जिन भावों को जगाना चाहता है, उनके बारे में जानने के लिए नवरस, यानी नौ रस देखें।

इस लेख के लिए प्रयुक्त स्रोत: हिंदुस्तानी और कर्नाटक लय पर सामान्य संगीत-शिक्षा के संदर्भ-ग्रंथ, तथा ताल (tala), तीनताल और तबले पर विकिपीडिया के लेख। गिनती के तरीके, बोलों के नाम और विभाजन गुरुओं और घरानों के बीच भिन्न हो सकते हैं। छायाचित्र क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के अंतर्गत प्रयुक्त हैं, और हर चित्र के नीचे श्रेय दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  1. भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल क्या है?

    ताल मात्राओं का बार-बार दोहराया जाने वाला चक्र है, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत की लय को व्यवस्थित करता है। इसके अपने विभाजन, तालियाँ, खाली और उच्चारित बोल होते हैं।

  2. तीनताल में कितनी मात्राएँ होती हैं?

    तीनताल में 16 मात्राएँ होती हैं, जो चार-चार के चार समूहों में बँटी हैं; ताली मात्रा 1, 5 और 13 पर पड़ती है और खाली मात्रा 9 पर होती है।

  3. ताल में सम क्या है?

    सम चक्र की पहली मात्रा है और हर स्वर-पंक्ति के पहुँचने का बिंदु है।

  4. तीनताल का ठेका क्या है?

    धा धिन धिन धा, धा धिन धिन धा, धा तिन तिन ता, ता धिन धिन धा।

  5. ताली और खाली में क्या अंतर है?

    ताली ज़ोर वाली मात्रा को दर्शाने वाली थाप है, जबकि खाली हाथ की वह लहर है जो बिना ज़ोर वाली मात्रा को दर्शाती है।

  6. कौन-सा वाद्य ताल को थामे रखता है?

    हिंदुस्तानी संगीत में तबला, कर्नाटक संगीत में मृदंगम और ध्रुपद में पखावज।

  7. क्या हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में ताल एक जैसी है?

    विचार एक ही है, पर पद्धतियाँ अलग हैं। हिंदुस्तानी संगीत में तीनताल जैसे नामित चक्र हैं, जबकि कर्नाटक संगीत सात ताल-परिवारों और पाँच विभाजनों से चक्र बनाता है।

Jeevan Tipke
लेखक

Bachelor of Engineering (B.E.), MBA | Certified Digital Marketing Professional (SEMrush, LinkedIn, Amazon, Skillup & HubSpot)

जीवन टिपके BhaktiMeShakti पर हिंदू भक्ति और अध्यात्म पर लिखते हैं। वे आरती, चालीसा और मंत्रों के साथ-साथ प्रमुख देवी-देवताओं और त्योहारों से जुड़ी कथाओं, पूजा विधि और व्रत के नियमों पर सामग्री साझा करते हैं।