रानी की वाव, पाटन: इतिहास, देखने लायक बातें और घूमने की पूरी जानकारी

रानी की वाव, पाटन: इतिहास, देखने लायक बातें और घूमने की पूरी जानकारी

गुजरात के पाटन में स्थित रानी की वाव सड़क से देखने पर एक सपाट, धूल भरे मैदान जैसी लगती है। फिर अचानक ज़मीन नीचे उतरती है और आप सात मंज़िलों में गहरे जाती एक पत्थर की संरचना के किनारे खड़े होते हैं, जिसकी हर दीवार पर नक्काशीदार आकृतियाँ हैं। यह एक बावड़ी (गुजराती में “वाव”) है, जिसे 11वीं सदी में बनवाया गया था और जिसे 2014 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। इस गाइड में जानिए कि यह क्या है, सदियों तक ज़मीन के नीचे क्यों सुरक्षित रही, अंदर क्या देखना चाहिए और यात्रा की योजना कैसे बनाएँ।

रानी की वाव, पाटन (गुजरात) के भीतर नक्काशीदार स्तंभ और सीढ़ीदार मंज़िलें
रानी की वाव का भीतरी दृश्य। फ़ोटो: Bibhas87, विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।

रानी की वाव एक नज़र में

स्थानपाटन, उत्तरी गुजरात, सरस्वती नदी के किनारे
निर्माण काल11वीं सदी, चौलुक्य (सोलंकी) वंश के शासन में; सामान्यतः लगभग 1050–1063 ई.
किसने बनवाईरानी उदयमती ने, अपने पति राजा भीमदेव प्रथम की स्मृति में
शैलीमारू-गुर्जर स्थापत्य शैली
बनावटसात मंज़िलें, “उल्टे मंदिर” के रूप में बनी; लगभग 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी (स्रोतों में माप अलग-अलग मिलते हैं)
विश्व धरोहर दर्जा22 जून 2014 को सूचीबद्ध

बावड़ी क्या होती है और इतनी भव्य क्यों बनाई गई?

पश्चिमी भारत के सूखे इलाकों में बावड़ी की मदद से लोग तब भी भूजल तक पहुँच पाते थे जब जलस्तर नीचे चला जाता था: बाल्टी उतारने के बजाय सीढ़ियाँ उतरकर पानी तक पहुँचा जाता था। बावड़ियाँ विश्राम और मेल-मिलाप की जगह भी थीं और अक्सर उनमें छोटे मंदिर होते थे, यानी वे जल-स्रोत, सामाजिक स्थल और पवित्र स्थान, तीनों एक साथ थीं।

रानी की वाव इस विचार को चरम पर ले जाती है। इसके निर्माताओं ने कुएँ को एक उल्टे मंदिर की तरह रचा, जिसमें जल पवित्र केंद्र है और नक्काशीदार मंज़िलें उसकी ओर ले जाती हैं। मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य-ग्रंथों के वर्गीकरण में इसे “नंदा” प्रकार की बावड़ी बताया गया है, जिसमें एक प्रवेश द्वार और तीन मंडपनुमा मीनारें होती हैं।

इसे किसने और कब बनवाया?

परंपरा के अनुसार रानी उदयमती ने अपने पति भीमदेव प्रथम की याद में यह वाव बनवाई। भीमदेव चौलुक्य वंश के शासक थे, जिनकी राजधानी अणहिलवाड़ पाटन (आज का पाटन) थी। जैन मुनि मेरुतुंग की 1304 की एक रचना में भी उदयमती को इसका निर्माता बताया गया है।

सभी स्रोत हर बात पर एकमत नहीं हैं, और यह जान लेना अच्छा है कि मतभेद कहाँ हैं:

  • तिथि। कुछ स्रोत लगभग 1050 ई. बताते हैं, कुछ 1063 ई.। दोनों भीमदेव के शासनकाल के भीतर या उसके तुरंत बाद के हैं, इसलिए “11वीं सदी का तीसरा चरण” कहना सबसे सुरक्षित है।
  • क्या उदयमती विधवा थीं। कई विवरणों में उन्हें विधवा रानी बताया गया है, पर इतिहासकार इस पर बहस करते हैं कि उन्होंने इसे राजमाता के रूप में बनवाया या नहीं। कुछ का मत है कि इसे भीमदेव के निधन के बाद उदयमती और उनके पुत्र कर्ण ने पूरा किया।

सदियों तक ज़मीन के नीचे कैसे बची रही?

सरस्वती नदी की बाढ़ ने वाव को गाद से भर दिया और धीरे-धीरे यह ढाँचा नज़रों से ओझल हो गया। विवरणों के अनुसार लगभग 13वीं सदी में बाढ़ और नदी में आए बदलावों के कारण इसका उपयोग बंद हो गया। 1890 के दशक में जब पुरातत्वविद् हेनरी कज़िन्स और जेम्स बर्गेस यहाँ आए, तब यह दबी हुई थी और केवल कुआँ और कुछ स्तंभ ही दिखते थे।

नक्काशी की अच्छी हालत का श्रेय व्यापक रूप से इसी दबे रहने को दिया जाता है: गाद ने उन्हें मौसम और क्षति से बचाए रखा। एक यात्रा-मार्गदर्शिका के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1981 से 1987 के बीच इसकी खुदाई और जीर्णोद्धार किया। यह 2018 में जारी भारत के ₹100 के नोट के पिछले हिस्से पर भी छपी है।

अंदर क्या देखें

रानी की वाव की दीवार पर उकेरी गई चार भुजाओं वाली परशुराम की प्रतिमा, दोनों ओर स्त्री आकृतियाँ
रानी की वाव की दीवार पर उकेरी गई चार भुजाओं वाली परशुराम की प्रतिमा, दोनों ओर स्त्री आकृतियाँ। फ़ोटो: Snehrashmi, विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY-SA 4.0 (आकार बदला गया)।
  • नक्काशीदार पट्टिकाएँ। दीवारों पर लगभग 500 मुख्य और करीब 1,000 छोटी मूर्तियाँ हैं। इनमें से कई विष्णु के रूपों, जैसे राम, वामन और कल्कि अवतार, के साथ महिषासुरमर्दिनी और अप्सराओं को दर्शाती हैं।
  • सात मंज़िलें। एक-एक मंज़िल उतरते हुए देखिए कि स्तंभों वाले मंडप विशाल आयतन को छोटे-छोटे स्थानों में कैसे बाँटते हैं; यही इसे कुएँ के बजाय मंदिर जैसा बनाता है।
  • कुआँ। जल-कुंड और कुआँ आख़िरी सीढ़ियों के नीचे, दूसरे छोर पर है।
  • उदयमती की प्रतिमा। खुदाई के दौरान रानी की एक नक्काशीदार प्रतिमा मिली थी।

एक लोकप्रिय कथा कहती है कि वाव के तल से सिद्धपुर तक 30 किमी लंबी सुरंग थी, जो राजा के पलायन का मार्ग थी। यह कथा खूब दोहराई जाती है, पर मुझे इसके पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले, इसलिए इसे स्थापित तथ्य नहीं, लोक-कथा मानें।

पाटन कैसे पहुँचें

  • सड़क से: पाटन अहमदाबाद से लगभग 125–130 किमी दूर है। यात्रा-मार्गदर्शिकाएँ कार से करीब 2.5 घंटे बताती हैं; बसें धीमी हैं, लगभग 3.5 घंटे। मेहसाणा से बस द्वारा करीब एक घंटा लगता है।
  • रेल से: पाटन का अपना रेलवे स्टेशन है। मेहसाणा नज़दीक का बड़ा जंक्शन है।
  • हवाई मार्ग से: सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा अहमदाबाद है।

घूमने का सही समय और योजना के सुझाव

  • मौसम: भारत सरकार की पर्यटन वेबसाइट घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च को सबसे सुविधाजनक समय बताती है।
  • दिन का समय: एटलस ऑब्स्क्यूरा के अनुसार सुबह, खुलते ही पहुँचना बेहतर है।
  • शाम के कार्यक्रम: गुजरात पर्यटन सूर्यास्त के बाद 3D प्रोजेक्शन-मैपिंग शो और हेरिटेज लाइटिंग का प्रचार करता है। योजना बनाने से पहले वर्तमान समय की जाँच कर लें।
  • टिकट और समय: ये बदलते रहते हैं, इसलिए यात्रा से पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या गुजरात पर्यटन के आधिकारिक पृष्ठ पर पुष्टि कर लें। एक यात्री ने रानी की वाव के ई-टिकट पहले से बुक करने की बात लिखी है, इसलिए ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा जाँच लें।

मोढेरा के साथ यात्रा

यात्रा-लेखक अक्सर पाटन को मोढेरा के सूर्य मंदिर के साथ जोड़ते हैं, और दोनों आमतौर पर एक ही दिन में देखे जाते हैं। मोढेरा उसी वंश के समय बना था: एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण 1026 ई. में भीमदेव प्रथम के शासनकाल में हुआ, जिनकी याद में रानी की वाव बनी। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है और कोणार्क के सूर्य मंदिर की तरह अब पूजा-स्थल के रूप में प्रयोग में नहीं है। एक यात्रा-वृत्तांत के अनुसार पाटन से मोढेरा की दूरी लगभग 35–40 किमी है; अपनी योजना के लिए मार्ग की पुष्टि कर लें।

इस लेख के लिए प्रयुक्त स्रोत: विकिपीडिया पर संक्षेपित यूनेस्को विश्व धरोहर जानकारी; गुजरात पर्यटन के रानी की वाव और मोढेरा पृष्ठ; भारत सरकार की इनक्रेडिबल इंडिया वेबसाइट का रानी की वाव पृष्ठ; एटलस ऑब्स्क्यूरा; और आउटलुक ट्रैवलर की गुजरात गाइड। जहाँ स्रोत असहमत हैं, वहाँ ऊपर के पाठ में इसका उल्लेख है। तस्वीरें क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के अंतर्गत, प्रत्येक के नीचे दिए श्रेय के साथ उपयोग की गई हैं।

देखें: 3D में रानी की वाव

हिस्टोरिक एनवायरनमेंट स्कॉटलैंड का बनाया बावड़ी का 3D-स्कैनिंग वीडियो (अंग्रेज़ी में)। Historic Environment Scotland, YouTube.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  1. रानी की वाव कहाँ स्थित है?

    रानी की वाव उत्तरी गुजरात के पाटन में सरस्वती नदी के किनारे स्थित है, जो अहमदाबाद से लगभग 125 से 130 किमी दूर है।

  2. रानी की वाव किसने और क्यों बनवाई?

    परंपरा के अनुसार चौलुक्य (सोलंकी) वंश की रानी उदयमती ने 11वीं सदी में अपने पति भीमदेव प्रथम की स्मृति में इसे बनवाया। इतिहासकार सटीक तिथि पर बहस करते हैं, जो आमतौर पर लगभग 1050 से 1063 ई. मानी जाती है, और इस पर भी कि वे उस समय राजमाता थीं या नहीं।

  3. रानी की वाव यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल क्यों है?

    इसे 22 जून 2014 को बावड़ी-स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में सूचीबद्ध किया गया, जो सात मंज़िलों और सैकड़ों बारीक मूर्तियों वाले उल्टे मंदिर के रूप में बनी है।

  4. बावड़ी साधारण कुएँ से कैसे अलग होती है?

    बावड़ी में पानी तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की कतारें होती हैं, ताकि जलस्तर नीचे होने पर भी लोग उस तक पहुँच सकें। कई बावड़ियाँ मंदिरों वाली मेल-मिलाप की जगहें भी थीं।

  5. रानी की वाव घूमने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

    भारत की आधिकारिक पर्यटन वेबसाइट अक्टूबर से मार्च को सबसे सुविधाजनक मौसम बताती है, और एटलस ऑब्स्क्यूरा सुबह खुलते ही जाने की सलाह देता है।

  6. क्या सिद्धपुर तक 30 किमी की सुरंग सच है?

    यह एक लोकप्रिय स्थानीय कथा है, पर इस लेख के स्रोतों में इसके पुरातात्विक प्रमाण का उल्लेख नहीं है, इसलिए इसे लोक-कथा ही समझना बेहतर है।

  7. क्या उसी दिन मोढेरा भी देखा जा सकता है?

    कई यात्रा-मार्गदर्शिकाएँ पाटन को मोढेरा के सूर्य मंदिर के साथ एक दिन की यात्रा के रूप में जोड़ती हैं। एक यात्री के वृत्तांत में दूरी लगभग 35 से 40 किमी बताई गई है, पर योजना से पहले दोनों स्थलों का मार्ग और समय जाँच लें।

Jeevan Tipke
लेखक

Bachelor of Engineering (B.E.), MBA | Certified Digital Marketing Professional (SEMrush, LinkedIn, Amazon, Skillup & HubSpot)

जीवन टिपके BhaktiMeShakti पर हिंदू भक्ति और अध्यात्म पर लिखते हैं। वे आरती, चालीसा और मंत्रों के साथ-साथ प्रमुख देवी-देवताओं और त्योहारों से जुड़ी कथाओं, पूजा विधि और व्रत के नियमों पर सामग्री साझा करते हैं।